जब एक आदमी चुप हो जाता है
एक दिन ऐसा भी आता है,
जब आदमी हारता नहीं...
बस बोलना छोड़ देता है।
उसकी हँसी कहीं रास्तों में छूट जाती है,
उसकी आँखों की चमक
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब जाती है।
वह अपने सपनों का गला
खुद अपने हाथों से घोंट देता है,
ताकि उसके बच्चों के सपने
ज़िंदा रह सकें।
दुनिया पूछती है—
"कितना कमाते हो?"
कोई यह नहीं पूछता—
"कितना सहते हो?"
जिस दिन उसकी जेब खाली होती है,
उसी दिन कई रिश्तों का सच भी
सामने आ जाता है।
जो लोग कल तक साथ चलने की कसम खाते थे,
आज नज़रें चुराकर निकल जाते हैं।
उसके हिस्से में
न शिकायत आती है,
न आँसू...
क्योंकि उसे मालूम है,
अगर वह टूट गया,
तो उसके साथ
पूरा घर टूट जाएगा।
इसलिए वह हर सुबह
अपने बिखरे हुए दिल को समेटता है,
चेहरे पर मुस्कान पहनता है,
और फिर निकल पड़ता है...
एक और जंग लड़ने।
उसके पाँव थक जाते हैं,
लेकिन उम्मीद नहीं।
उसकी आँखें भर आती हैं,
लेकिन आँसू बाहर नहीं आते।
वह अकेला चलता है,
फिर भी पूरे परिवार का सहारा बना रहता है।
शायद इसी का नाम आदमी है...
जो अपने दर्द को
तकिए के नीचे दबाकर सो जाता है,
और अगली सुबह
फिर मुस्कुराकर दुनिया का सामना करता है।
याद रखना...
हर खामोश आदमी कमज़ोर नहीं होता।
कुछ लोग इसलिए चुप रहते हैं,
क्योंकि उनकी ज़िंदगी ने उन्हें
शब्दों से नहीं,
ज़ख्मों से बोलना सिखा दिया होता है।
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