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When the Last Breath Still Dreams

  They laughed when I walked with empty hands, Not knowing storms are born in silent lands. A broken pocket, a tired face, Yet destiny whispered, "Keep your pace." I was the dust beneath their feet, A nameless soul on a forgotten street. But every insult became my fire, Every failure lifted me higher. Mountains never bow to the sky, They rise because they refuse to die. The darkest coal, beneath the pain, Returns one day as a diamond's flame. I had no throne, no crown, no name, Only a heart that rejected shame. The world measured me by what I owned, I measured myself by seeds I'd sown. When hunger became my closest friend, I learned that courage has no end. The nights were long, the roads were cold, But dreams are worth more than gold. Even when my final breath drew near, I refused to surrender to fear. For legends are not those who survive— They are the ones who keep hope alive. If my heartbeat slows before the dawn, My vision will still carry on. Empires are never b...

जब एक आदमी चुप हो जाता है

  एक दिन ऐसा भी आता है, जब आदमी हारता नहीं... बस बोलना छोड़ देता है। उसकी हँसी कहीं रास्तों में छूट जाती है, उसकी आँखों की चमक ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब जाती है। वह अपने सपनों का गला खुद अपने हाथों से घोंट देता है, ताकि उसके बच्चों के सपने ज़िंदा रह सकें। दुनिया पूछती है— "कितना कमाते हो?" कोई यह नहीं पूछता— "कितना सहते हो?" जिस दिन उसकी जेब खाली होती है, उसी दिन कई रिश्तों का सच भी सामने आ जाता है। जो लोग कल तक साथ चलने की कसम खाते थे, आज नज़रें चुराकर निकल जाते हैं। उसके हिस्से में न शिकायत आती है, न आँसू... क्योंकि उसे मालूम है, अगर वह टूट गया, तो उसके साथ पूरा घर टूट जाएगा। इसलिए वह हर सुबह अपने बिखरे हुए दिल को समेटता है, चेहरे पर मुस्कान पहनता है, और फिर निकल पड़ता है... एक और जंग लड़ने। उसके पाँव थक जाते हैं, लेकिन उम्मीद नहीं। उसकी आँखें भर आती हैं, लेकिन आँसू बाहर नहीं आते। वह अकेला चलता है, फिर भी पूरे परिवार का सहारा बना रहता है। शायद इसी का नाम आदमी है... जो अपने दर्द को तकिए के नीचे दबाकर सो जाता है, और अगली सुबह फिर मुस्कुराकर दुनिया का सामना करता ह...

The Weight He Never Named

A man is not broken the day he loses his money. He is broken the day he realizes that no one waits for his tears. His pockets grow empty, his dreams grow quiet, and the laughter that once filled his home becomes a memory he carries alone. The world measures him by what he brings, never by what he survives. His phone grows silent. The friends who once called him "brother" become strangers with perfect excuses. Love fades when comfort fades. Only responsibilities remain. Every morning, he wears courage like an old coat— torn, heavy, and invisible. He smiles at his family while hiding storms in his chest. He says, "I'm fine," because their peace is worth more than his pain. He buries his fears, feeds everyone before himself, and keeps walking on roads that have forgotten his name. No applause. No audience. No rescue. Just another sunrise, another battle, another promise to the people who call him home. The strongest men are rarely the loudest. They are the ones who...

तू क्या जाने..

  मैंने तुझे पाने की हर कोशिश की थी, हर दुआ में बस तेरी ही ख़्वाहिश की थी। तू क्या जाने, कितने रास्ते बदले मैंने, तेरे लिए अपने ही सपनों से समझौते किए मैंने। लोगों ने जो कहा, उसे झूठा बता दिया, अपने ही दिल को तेरे नाम सज़ा दिया। तू क्या जाने, कैसी-कैसी रातें रोकर कटीं, हर सुबह तेरी उम्मीद में ही आँखें खुलीं। हर गलती तेरी हँसकर माफ़ करता रहा, हर बार तुझे प्यार से समझाता रहा। पर तूने मेरी ख़ामोशी भी न समझी, मेरी मोहब्बत की गहराई भी न समझी। तुझे मालूम था कि तेरे हर लफ़्ज़ से दर्द होता है, फिर भी वही ज़ख्म देना तेरा रोज़ का किस्सा होता है। किस-किस हालात ने मुझे तोड़ा, तू क्या जाने, मैं मुस्कुराता रहा, मगर अंदर से बिखरता रहा। अब बस मौत का आना ही बाकी रह गया था, बाकी हर दर्द तो ज़िंदगी दे ही चुकी थी। फिर भी तेरी ख़ुशी की दुआ करता रहा, क्योंकि मेरी मोहब्बत, मेरी शिकायतों से बड़ी थी। शायरी तुझे पाने की हर कोशिश अधूरी रह गई, मेरी हर दुआ तेरे दर पर ही ठहर गई। तूने दर्द दिया, मैं मुस्कुराता रहा, मेरी पूरी ज़िंदगी बस तुझे समझाते-समझाते गुज़र गई।              ...

बचपन — सपनों का स्वर्णिम संसार 🌈

(1) सुनहरी सुबह सूरज की पहली किरणों जैसा, निर्मल था अपना बचपन, हँसी की मीठी धुन में डूबा खुशियों से भरा था जीवन। न कोई डर था कल का हमको, न भविष्य की थी पहचान, बस खेलों में बीतता जाता हर दिन जैसे कोई वरदान। (2) खेलों की मस्ती कभी पतंग के संग उड़ जाते, कभी कंचों में हार-जीत, कभी बारिश में नाच उठते, कभी मिट्टी में लिखते प्रीत। कागज़ की छोटी नावों में सपनों का था सारा भार, छोटी-सी उन गलियों में ही बसता था अपना संसार। (3) ममता का सागर माँ की लोरी चाँद सी लगती, नींद का देती प्यारा घर, पिता की डाँट में भी छिपा था स्नेह का गहरा समंदर। उनकी उँगली थामे-थामे हमने चलना सीख लिया, उनकी सीखों की रोशनी से जीवन का अर्थ समझ लिया। (4) यादों की छाया अब जब जीवन तेज़ चला है, हर दिन नई कहानी है, दिल के कोने से आवाज़ आती— “बचपन ही सच्ची रवानी है।” वो गलियाँ, वो हँसी के मेले, वो सपनों की प्यारी उड़ान, आज भी दिल में खिल उठते हैं जैसे महके कोई बाग़ान। (5) जीवन का सत्य दौलत, शोहरत सब मिल जाए, फिर भी मन क्यों सूना है? क्योंकि बचपन की मासूमियत जीवन का असली गहना है। इसलिए दिल यही कहता— रखना मन को सदा जवान, क्योंकि ह...

💔 वो आख़िरी अलविदा

💔 वो आख़िरी अलविदा ना जाने किस बात पर, दिल ने तुझसे ख़ामोशियाँ माँग लीं, लफ़्ज़ थे बहुत, पर आँखों ने सब कहानी बयाँ कर दीं। तेरे जाने की आहट, आज भी दरवाज़े पे ठहरी है, तेरे कदमों की वो धुन, अब भी मेरी धड़कनों में बहरी है। वो आख़िरी “अलविदा”, कुछ ऐसे कहा तूने मुस्कुराकर, जैसे हम कभी अजनबी थे, न कभी मिले, न कोई असर। मैंने भी हँसकर कहा, “ख़्याल रखना,” जैसे सब ठीक हो, पर अंदर कुछ टूटा था, जो अब तक ठीक नहीं हो। तेरे बाद सीखा है मैंने — कभी-कभी मोहब्बत भी मुकम्मल नहीं होती, और कभी-कभी “अलविदा” ही, सबसे गहरी मोहब्बत होती। अब जब हवा तेरे शहर से गुज़रती है, उसमें तेरा नाम नहीं, पर तेरी ख़ुशबू ज़रूर होती है। और मैं बस सोचता हूँ — काश उस आख़िरी पल, तू रुक जाती ज़रा, शायद “अलविदा” का मतलब, “हमेशा” नहीं होता... 💔                                                 ---@ Eoin Sushant 

गुनाहों का पुतला

गुनाहों का पुतला गुनाहों का पुतला हूँ मैं, ज़मीर से रूठा हूँ मैं। चेहरा हँसता, दिल रोता है, अपने ही खून से लथपथ हूँ मैं। झूठ की स्याही से लिखी कहानी, हर सच को मैंने जला डाला। कितनों के सपनों को तोड़ा, कितनों की किस्मत मिटा डाला। रिश्तों की लाशें कंधों पे ढोई, पाप की नदियों में रोज़ मैं रोई। आईना मुझसे सवाल करे जब, नज़रें झुका लूँ — इतनी शर्मिंदा होई। मैंने मासूम आँखों से रोशनी छीनी, मैंने ही सजाई कई कब्रें ज़मीं पर। फिर भी ये दिल चैन न पा सका, बस डूबा रहा अपने ही गुनाहों के समंदर। पर कहीं भीतर एक लौ जलती है, अंधेरों में उम्मीद पलती है। अगर आँसुओं से धुल जाए दिल, तो शायद रूह भी सँवरती है। एक दिन ये पुतला राख होगा, पर राख से नया इंसान होगा। सच्चाई की रोशनी में ढलकर, निर्दोष, उजला अरमान होगा। गुनाहों का पुतला हूँ मैं… पर शायद कल, इंसान बन जाऊँ मैं।                                   ~ Eoin Sushant