"छाया से उजाले तक"
छाँव में बैठा था मैं, थका हुआ, मौन,
पलकों पर लहराते थे टूटे हुए स्वप्नों के बौन।
हर मोड़ पर प्रश्न थे, उत्तर कहीं नहीं,
अपनों में भी खो गया था, अपना ही कहीं नहीं।
हर सुबह कहती थी — उठो, कुछ नया करो,
पर मन कहता — रुक जाओ, थोड़ा और संजो।
वक़्त की अंगुली पकड़ चलना चाहा कई बार,
पर पाँव जकड़े थे डर और असफलता के तार।
एक दिन आई एक चुप सी आवाज़ भीतर से,
"तू ही सवाल है, तू ही जवाब है, उसी समंदर से।"
मैंने खुद से पूछा — क्यों भागता हूँ मैं?
किससे डरता हूँ? और क्यों हारता हूँ मैं?
उत्तर मिले... धीरे-धीरे, आँसुओं के बीच,
ज़िंदगी थी शिक्षक, और मैं... उसकी सीख।
हर ठोकर ने कुछ कहा, हर गिरावट ने सिखाया,
जो उजाले की तलाश में था, वो खुद ही दीपक बन पाया।
अब समझा —
संघर्ष ही पहचान है, और खो जाना ही राह है,
जब तक खुद से मिल न सको, तब तक अधूरी चाह है।
छाया से गुजर कर ही सूरज को छूना होगा,
भीतर के अंधेरे से पहले दोस्ती करना होगा।
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केंद्रीय भाव (Central Idea):
"छाया से उजाले तक" कविता का केंद्रीय विचार यह है कि जीवन में संघर्ष, असमंजस, और आत्म-संदेह हर किसी को झेलना पड़ता है, परंतु इन्हीं अनुभवों के बीच इंसान अपनी असली पहचान पाता है। खुद को समझना, स्वीकारना और अपनी कमजोरियों से सीख लेकर आगे बढ़ना — यही आत्म-खोज की प्रक्रिया है। जब इंसान भीतर की छाया से गुजरता है, तब ही वह बाहर के उजाले को समझ पाता है
~ Eoin Sushant
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