बचपन — सपनों का स्वर्णिम संसार 🌈
(1) सुनहरी सुबह सूरज की पहली किरणों जैसा, निर्मल था अपना बचपन, हँसी की मीठी धुन में डूबा खुशियों से भरा था जीवन। न कोई डर था कल का हमको, न भविष्य की थी पहचान, बस खेलों में बीतता जाता हर दिन जैसे कोई वरदान। (2) खेलों की मस्ती कभी पतंग के संग उड़ जाते, कभी कंचों में हार-जीत, कभी बारिश में नाच उठते, कभी मिट्टी में लिखते प्रीत। कागज़ की छोटी नावों में सपनों का था सारा भार, छोटी-सी उन गलियों में ही बसता था अपना संसार। (3) ममता का सागर माँ की लोरी चाँद सी लगती, नींद का देती प्यारा घर, पिता की डाँट में भी छिपा था स्नेह का गहरा समंदर। उनकी उँगली थामे-थामे हमने चलना सीख लिया, उनकी सीखों की रोशनी से जीवन का अर्थ समझ लिया। (4) यादों की छाया अब जब जीवन तेज़ चला है, हर दिन नई कहानी है, दिल के कोने से आवाज़ आती— “बचपन ही सच्ची रवानी है।” वो गलियाँ, वो हँसी के मेले, वो सपनों की प्यारी उड़ान, आज भी दिल में खिल उठते हैं जैसे महके कोई बाग़ान। (5) जीवन का सत्य दौलत, शोहरत सब मिल जाए, फिर भी मन क्यों सूना है? क्योंकि बचपन की मासूमियत जीवन का असली गहना है। इसलिए दिल यही कहता— रखना मन को सदा जवान, क्योंकि ह...